मुंबई, 9 फरवरी 2026: चिकित्सा विज्ञान में एक ऐतिहासिक सफलता हासिल हुई है, जहां वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ‘यूनिवर्सल किडनी’ विकसित की है जो किसी भी ब्लड ग्रुप के मरीज के साथ मैच कर सकती है। यह खोज किडनी ट्रांसप्लांट की दुनिया को बदल सकती है, जहां ब्लड ग्रुप की असंगति के कारण हजारों मरीज लंबी प्रतीक्षा सूची में फंसे रहते हैं। कनाडा और चीन के शोधकर्ताओं की टीम ने इस क्रांतिकारी तकनीक को विकसित किया है, जो एंजाइम्स की मदद से डोनर किडनी के ब्लड टाइप को यूनिवर्सल ओ टाइप में बदल देती है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से चल रहे इस रिसर्च का परिणाम अब सामने आया है। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया (यूबीसी) और एविवो बायोमेडिकल इंक के वैज्ञानिकों ने विशेष एंजाइम्स का उपयोग करके ब्लड टाइप ए वाली किडनी से एंटीजन (चीनी अणु) हटा दिए, जो इसे ब्लड टाइप ओ में बदल देते हैं। ब्लड टाइप ओ को ‘यूनिवर्सल डोनर’ कहा जाता है क्योंकि यह सभी ब्लड ग्रुप्स के साथ संगत होता है। इस तकनीक का पहला मानव परीक्षण अक्टूबर 2025 में सफलतापूर्वक किया गया, जहां एक ब्रेन-डेड व्यक्ति में ऐसी परिवर्तित किडनी ट्रांसप्लांट की गई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, पारंपरिक ट्रांसप्लांट में ब्लड ग्रुप मैच न होने पर मरीज को इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएं दी जाती हैं, जो संक्रमण और अन्य जोखिम बढ़ाती हैं। लेकिन इस नई विधि से ऐसी जरूरत कम हो जाएगी। डॉ. जॉन कोलमैन, एविवो के सीईओ ने कहा, “यह तकनीक डोनर ऑर्गन की उपलब्धता को दोगुना कर सकती है और वेटिंग लिस्ट पर मौतों को रोक सकती है।” नेचर बायोमेडिकल इंजीनियरिंग जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी में बताया गया कि एंजाइम्स किडनी की सतह से एंटीजन को प्रभावी ढंग से हटाते हैं, बिना ऑर्गन को नुकसान पहुंचाए।
भारत जैसे देशों में जहां हर साल लाखों लोग किडनी फेलियर से जूझते हैं, यह खोज जीवनरक्षक साबित हो सकती है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में किडनी ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा सूची पर 1.5 लाख से अधिक मरीज हैं, लेकिन केवल 10-15 हजार ट्रांसप्लांट ही हो पाते हैं। ब्लड ग्रुप असंगति एक प्रमुख बाधा है। इस यूनिवर्सल किडनी से डोनर पूल बढ़ेगा, जिससे ट्रांसप्लांट की सफलता दर 90% से ऊपर जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक अन्य ऑर्गन्स जैसे लिवर और हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए भी दरवाजे खोल सकती है।
हालांकि, चुनौतियां बाकी हैं। इस प्रक्रिया की लागत और उपलब्धता को बढ़ाने की जरूरत है। क्लिनिकल ट्रायल्स अभी प्रारंभिक चरण में हैं, और लाइव मरीजों पर बड़े पैमाने पर परीक्षण बाकी हैं। फिर भी, यह मेडिकल साइंस में एक मील का पत्थर है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि अगले कुछ वर्षों में यह तकनीक वैश्विक स्तर पर उपलब्ध हो।
यह सफलता न केवल मरीजों के लिए आशा की किरण है बल्कि ऑर्गन डोनेशन को बढ़ावा देगी। अगर आप या आपके परिवार में कोई किडनी समस्या है, तो डॉक्टर से परामर्श लें और ऑर्गन डोनेशन के बारे में जागरूक रहें। चिकित्सा जगत में यह क्रांति लाखों जिंदगियां बचा सकती है।
(लेखक: स्वास्थ्य संवाददाता)
